क्षेत्रीय दलों की राजनीति पर भारी पड़ सकती है जातिगत गणना, हिंदी भाषी प्रदेशों के साथ कई राज्यों में उठी मांग

क्राइम मुखबिर से उप संपादक रतन गुप्ता की रिपोर्ट –


क्रामुस -कर्नाटक में तो एक दशक पहले ही इस तरह की गणना कराई जा चुकी है। यह अलग बात है कि उसकी रिपोर्ट जारी करने की हिम्मत कांग्रेस की तत्कालीन सिद्दरमैया सरकार ने नहीं जुटाई। सच यह भी है कि कर्नाटक की जिस सरकार ने जातियों की आबादी गिनी उसे अगले विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। जातिगत गणना के मुद्दे पर राजनीति करने वाले अधिकतर क्षेत्रीय दल हैं।



क्षेत्रीय दलों की राजनीति पर भारी पड़ सकती है जातिगत गणना, हिंदी भाषी प्रदेशों के साथ कई राज्यों में उठी मांग
जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी नारा अब अपने आप राजनीति के केंद्र में आ जाएगा।

जाति आधारित गणना की रिपोर्ट सार्वजनिक होने का असर व्यापक होगा।
एनडीए के कई घटक दल भी जाति आधारित गणना के पक्ष में खड़े हो गए हैं।
बिहार में जाति आधारित गणना की रिपोर्ट सार्वजनिक होने का असर व्यापक होगा। यह किसी एक प्रदेश या गठबंधन तक सीमित नहीं रहेगा। हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड के अतिरिक्त महाराष्ट्र समेत कई राज्यों से भी मांग उठने लगी है। आइएनडीआइए गठबंधन के साथ ही एनडीए के कई घटक दल भी जाति आधारित गणना के पक्ष में खड़े हो गए हैं।

रिपोर्ट सार्वजनिक होने का असर व्यापक-
कर्नाटक में तो एक दशक पहले ही इस तरह की गणना कराई जा चुकी है। यह अलग बात है कि उसकी रिपोर्ट जारी करने की हिम्मत कांग्रेस की तत्कालीन सिद्दरमैया सरकार ने नहीं जुटाई। सच यह भी है कि कर्नाटक की जिस सरकार ने जातियों की आबादी गिनी, उसे अगले विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। जातिगत गणना के मुद्दे पर राजनीति करने वाले अधिकतर क्षेत्रीय दल वह हैं, जिनका परंपरागत नारा है – जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।


वर्चस्व वाली जातियों की भूमिका सीमित होने का खतरा-
स्पष्ट है कि यह नारा अब अपने आप राजनीति के केंद्र में आ जाएगा। इससे राजनीति में वर्चस्व वाली जातियों की भूमिका सीमित होने का खतरा बढ़ जाएगा, क्योंकि अपेक्षाकृत कम संख्या वाली जातियों के बीच से हिस्सेदारी की मांग बढ़ने लगेगी। लोकसभा-विधानसभा चुनावों में वे भी अपनी आबादी के अनुरूप टिकट की मांग करने लगेंगे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भी इससे अछूता नहीं रहेंगे। लाभार्थी योजनाओं के विस्तार के वादों की सूची लंबी हो सकती है। साथ ही आरक्षण के अंतर्गत आरक्षण की मांग भी उठेगी।

अन्य राज्यों से जातिगत गणना की मांग आने लगी-
बहरहाल, ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल को अगर छोड़ दें तो बिहार की तर्ज पर अन्य राज्यों से जातिगत गणना की मांग आने लगी है। सबसे बड़ी मांग वामदलों की ओर से आ रही है। भाकपा एवं माकपा बिहार की तरह पूरे देश में विभिन्न जातियों की आबादी जानना चाहती हैं। बिहार में सक्रिय भाकपा माले का समर्थन तो पहले से ही प्राप्त है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी पुरजोर मांग उठाई है। यूपी में अपना दल के दोनों गुटों के साथ निषाद पार्टी भी इसी रास्ते पर है। ओपी राजभर की पार्टी सुहैलदेव भी प्रबल पक्षधर है।


कांग्रेस के सत्ता में आने पर जातिगत गणना होगी-
राहुल गांधी ने पहले ही घोषणा कर रखी है कि कांग्रेस यदि केंद्र की सत्ता में आती है तो जातिगत गणना कराई जाएगी, क्योंकि बीमारी का पता लगाने के लिए एक्सरे जरूरी है। देखादेखी एनडीए के सहयोगी दल भी मुखर होने लगे हैं। बिहार में एनडीए के साथी तीनों दलों (लोजपा के दोनों गुट और जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) ने भी बिहार की तर्ज पर देशभर में जातिगत गणना की मांग कर दी है। रामदास आठवले की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया का बयान भी इसके पक्ष में आया है। महाराष्ट्र में सक्रिय अजीत पवार एवं एकनाथ शिंदे की पार्टी ने भी इसकी मांग की है। दक्षिण भारत में डीएमके तो इस अवधारणा का जन्मदाता है।

क्राइम मुखबिर
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